Tuesday, March 24, 2020

कोरोना वायरस: इन मुल्कों से सीख सकते हैं भारत और बाक़ी देश




पश्चिमी देशों में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं.
भारत में भी हाल के दिनों में कुछ नए मामलों की पुष्टि हुई है. कई देशों ने हालात को काबू करने के इरादे से कड़े क़दम उठाए हैं.

इनमें स्कूल बंद करने से लेकर अन्य कई तरह की पाबंदियां शामिल हैं.

पश्चिमी देशों से तुलना करें तो सिंगापुर, हांगकांग और ताइवान में कई हफ़्ते पहले ही कोरोना वायरस फैल गया था.

मगर चीन के नज़दीक होने के बावजूद इन एशियाई देशों में संक्रमण के मामले दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है.



पहला सबक: गंभीरता बरतें और तुरंत हरकत में आएं


स्वास्थ्य विशेषज्ञ संक्रमण का फैलाव रोकने के लिए ज़रूरी क़दमों को लेकर एकमत हैं - बड़े पैमाने पर टेस्ट करो, संक्रमित लोगो को अलग करो और सोशल डिस्टैंसिंग यानी भीड़भाड़ में जाने और लोगों के क़रीब जाने से बचने को बढ़ावा दो.
अब पश्चिमी देशों में ये क़दम उठाए जाने लगे हैं मगर समस्या यह है कि कई देश इसे लेकर तुरंत हरकत में नहीं आए. विश्व स्वास्थ्य संगठन में रिसर्च पॉलिसी के पूर्व निदेशक तिक्की पंगेस्तू कहते हैं, "अमरीका और ब्रिटेन ने एक अवसर गंवाया है. उनके पास चीन के बाद दो महीने थे मगर उन्हें लगा कि चीन बहुत दूर है और उन्हें कुछ नहीं होगा."
WHO को चीन ने बीते साल 31 दिसंबर को ही 'सार्स जैसे रहस्यमय निमोनिया' के मामलों की जानकारी दी थी. उस समय तक इंसानों से एक-दूसरे में इसके फैलने की पुष्टि नहीं हुई थी. वायरस को लेकर ज्यादा जानकारी भी नहीं थी मगर तीन दिनों के अंदर सिंगापुर, ताइवान और हांगकांग ने अपनी सीमाओं पर स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी.
ताइवान ने वुहान से आने वाले विमानों के यात्रियों को नीचे उतारने से पहले उनकी जांच भी की. जैसे जैसे वैज्ञानिकों को इस वायरस के बारे में और पता चला, यह सामने आया कि जिन संक्रमित लोगों के अंदर लक्षण नहीं पाए गए हैं, वे भी दूसरों में संक्रमण फैला सका है. इसलिए कोरोना की पुष्टि के लिए टेस्ट किया जाना बेहद अहम बन गया.





दूसरा सबक़: टेस्ट को सुलभ और सस्ता बनाया जाए



शुरू में दक्षिण कोरिया में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े. मगर इसने संक्रमण की पुष्टि के लिए टेस्ट विकसित किया और 2 लाख 90 हजार से अधिक लोगों का परीक्षण किया. हर रोज यहां करीब 10 हजार लोगों का मुफ्त परीक्षण हो रहा है.
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में इमर्जिंग इन्फ़ेक्शियस डिज़ीज़िस के प्रोफ़ेसर ओई इंग इयॉन्ग कहते हैं, "जिस तरह से उन्होंने इंतज़ाम किए और जनता के टेस्ट करवाए, वह कमाल है."
2015 में जब मिडल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रॉम फैला था, तब दक्षिण कोरिया में 35 लोगों की मौत हुई थी. तभी से यहां संक्रामक बीमारियों के टेस्ट की मंज़ूरी के लिए विशेष सिस्टम है ताकि तुरंत टेस्ट किए जा सकें
वहीं, अमरीका में टेस्टिंग में देरी की गई. शुरुआती टेस्ट किट ख़राब थे और प्राइवेट लैब में करवाए जाने वाले टेस्ट को मंज़ूरी मिलने में देरी हुई. बहुत सारे लोग महंगे होने के कारण टेस्ट नहीं करवा पाए. बाद में क़ानून बनाया गया और सभी के लिए फ्री टेस्टिंग का प्रावधान किया गया.

इस बीच ब्रिटेन ने कहा है कि जो लोग अस्पताल में हैं, उन्हीं का रूटीन में टेस्ट किया जाएगा. इससे उन लोगों की पहचान करना मुश्किल है, जो संक्रमण की चपेट में तो आ चुके हैं मगर कोई लक्षण हीं है और वे घर पर हैं. प्रोफ़ेसर पगेस्तू का कहना है कि कुछ देशों में के पास टेस्ट के लिए पर्याप्त किट्स नहीं हैं.

हालांकि, वो मानते हैं कि व्यापक स्तर पर टेस्टिंग करना बहुत ही प्राथमिकता से किया जाने वाला काम होना चाहिए. वह कहते हैं कि इससे उन लोगों की भी पहचान हो सकती है जो अस्पताल में नहीं हैं मगर इधर-उधर घूमकर दूसरों को भी संक्रमित कर रहे हैं.

तीसरा सबक: ट्रेस करो और अलग-थलग रखो


जिन लोगों में लक्षण हैं, उनकी पहचान करना ही काफी नहीं है. वे लोग किस-किस के संपर्क में आ चुके हैं, इसका पता लगाना भी काफ़ी अहम है. सिंगापुर में जासूसों ने 6000 ऐसे लोगो को सीसीटीवी फुटेज वगैरह के माध्यम से ट्रेस किया जो संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में हो सकते थे.
फिर इनका टेस्ट किया गया और उन्हें साफ़ नतीजा आने तक अकेले में रहने का आदेश दिया गया. हांगकांग में तो उन लोगों को भी ट्रेस किया जाता है जो किसी संक्रमित व्यक्ति में लक्षण दिखने से दो दिन पहले तक उसके संपर्क में आए हों.
जिन लोगों को खुद ही अकेले रहने के लिए कहा गया है, वे ऐसा कर रहे हैं या नहीं, यह जांचने के लिए कई तरीके अपनाए गए हैं. हांगकांग में विदेश से आने वाले लोगों को बांह में एक इलेक्ट्रिक ब्रेसलेट पहनना होता है जो उनकी मूवमेंट को ट्रैक करता है.